विजयादशमी विशेष- क्या सिर्फ ज्ञानी होने पर रावण का महिमामंडन किया जाना सही है? पढ़िए ये लेख!!!
Delhi, ( Rajeshwar Singh ) एक ऐसे समय में जब हर तरफ गदंगी को भौतिक तौर पर साफ़ करने के लिए दिन रात प्रयत्न किये जा रहे हैं और उसका असर भी देखने को मिल रहा है. हर आदमी आज सफाई के प्रति जागरूक हो रहा है. चुनावों में भी किसी साफ़ सुथरे छवि वाले प्रत्याशी को वोट देने के लिए अपील करते हजारों लोग दिख जाएंगे. इन सब बातों का जिक्र आज करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि आज दशहरे का दिन है और त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने आज के दिन ही एक ऐसी गंदगी को साफ़ करने के लिए शस्त्र उठाया था जिस गंदगी को देखकर लोगों को लगता था कि इस गंदगी को साफ़ करना नामुमकिन है. वो गन्दगी सड़क पर पड़ा हुआ कूड़ा कचरा नहीं अपितु ज्ञानी कहे जाने वाले रावण के अंदर अधर्म के रूप में भरी हुई गंदगी थी. ठीक उसी तरह महाभारत का युद्ध आज ही के दिन शुरू हुआ, जिस युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्मियों और पापियों द्वारा फैलाई गयी गंदगी को खत्म करने के लिए गीता का उपदेश दिया था.
आज कलियुग में भी २०१४ के बाद से भौतिक गन्दगी को साफ़ करने में तो सभी वर्गों ने भरपूर सहयोग किया मगर मानसिक गन्दगी का प्रकोप बढ़ता चला गया, जी हाँ, वही मानसिक गंदगी जो रावण के दिमाग में घुसी हुई थी. रावण नामक गंदगी को तो भगवान राम ने खत्म कर दिया मगर मॉडर्न कलियुग में एक नया प्रचलन सा शुरू हो गया है. समाज का एक वर्ग रावण का समर्थन करने लगा. जब आप उसके कारणों में जाने का प्रयत्न करेंगे तो एक बड़ा कारण सामने निकल कर आता है कि रावण ब्राह्मण था. अब रावण की जाति क्या रही होगी वो तो हर मामले में जाति ढूढ़ने वाले लोग ही बता पाएंगे. मगर इतना जरूर कहा जा सकता है कि रावण एक ज्ञानी पुरुष था. मान्यतानुसार रावण में अनेक गुण भी थे। सारस्वत ब्राह्मण पुलस्त्य ऋषि का पौत्र और विश्रवा का पुत्र रावण एक परम शिव भक्त, राजनीतिज्ञ , महाप्रतापी, महापराक्रमी योद्धा , अत्यन्त बलशाली , शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता ,प्रकान्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी था।
मगर क्या रावण के ब्राह्मण जाति का होने या ज्ञानी होने पर उसकी पूजा की जा सकती है? क्या उसकी आराधना की जा सकती है? क्या उसे अपना आदर्श माना जा सकता है? क्या उसके कृत्यों का वास्तविक जीवन में अनुसरण किया जा सकता है? अगर किया जा सकता है तो उन लोगों के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम क्या है? क्या रावण और भगवान राम के जीवन का एक साथ अनुसरण किया जा सकता है ? क्या दोनों को अपना आराध्य माना जा सकता है? क्या मयान में दो तलवारें आ सकती हैं? कई बार लोग सफाई देते नजर आते हैं कि रावण सीता को हाथ नहीं लगाया क्योंकि रावण की नियत साफ़ थी, अब उनको ये बात कौन बताये कि सीता से हाथ न लगाना रावण का गुण नहीं बल्कि उसकी मजबूरी थी.
दरअसल स्वर्ग की अप्सरा रम्भा रावण के भतीजे नलकुबेर से मिलने के लिए जा रही थी मगर रास्ते में बुरी नियत से उसे रावण ने रोक लिया और उसके साथ जबरदस्ती कुकर्म कर दिया, जिसके बाद नलकुबेर ने उसे श्राप दे दिया कि वो किसी पतिव्रता स्त्री को नहीं छू सकता, उसकी बिना मर्ज़ी के उसको हाथ तक नहीं लगा सकता था. मगर रावण के मॉडर्न अंधभक्त आज रावण की नियत पर सफाई देते नजर आते रहे हैं.
रामायण में रावण के वध होने पर मन्दोदरी विलाप करते हुए कहती है, “अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म व्यवस्थाओं को तोड़ने वाले, देव-असुर और मनुष्यों की कन्याओं का जहाँ तहाँ से हरण करने वाले! आज तू अपने इन पाप कर्मों के कारण ही वध को प्राप्त हुआ है।” तुलसीदास जी केवल उसके अहंकार को ही उसका मुख्य अवगुण बताते हैं। अगर वास्तव में देखा जाये तो आज के समय में रावण का अनुसरण करने वाले सिर्फ रावण का अनुसरण नहीं कर रहे बल्कि ऐसा करके वो महिलाओं का अपमान करने का समर्थन कर रहे हैं, महिलाओं का अपहरण करने वालों का समर्थन कर रहे हैं, अभिमान का समर्थन कर रहे हैं, अहंकार का समर्थन कर रहे हैं, क्रूरता और अत्याचार का समर्थन कर रहे हैं.
अगर ज्ञानी होने के आधार पर रावण को अपना आराध्य माना जाता है तो फिर आज के समय में ओसामा बिन लादेन भी सही है, मन्नान वानी भी सही है और जाकिर नाइक जैसे बौद्धिक आतंकवाद फैलाने वाले लोग भी सही हैं. फिर तो कन्हैया कुमार भी और उम्र खालिद जैसे देशद्रोही नारे लगाने वाले लोग भी सही हैं क्योंकि वो पढ़े लिखे लोग हैं और सही हैं वो नक्सलवाद को बढ़ावा देने वाले अर्बन नक्सली जो अपने सिर पर नाना प्रकार की डिग्रियां लादे घूम रहे हैं और सही है वो वामपंथी इतिहासकार भी जो समय समय पर देशद्रोहियों और आतंकियों का समर्थन करने के साथ ही अत्याचारी मुगलों की शान में कसीदे पढ़ते नजर आते हैं. ये भी तो पढ़े लिखे लोग ही हैं, जिन्हे शुद्ध भाषा में रावण की तरह ‘ज्ञानी’ कह सकते हैं.
आजकल रावण की प्रशंसा में बहुत से लेख सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहे हैं, उन लेखों को पढ़ कर साफ़ समझा जा सकता है कि उनमे किस तरह भगवान राम को एक दोषपूर्ण किरदार के रूप में दिखाने की कुटिल कोशिश की गयी है. मगर ऐसा लिखने वाले ज्यादातर वही लोग हैं जो एक तरफ ब्राह्मणवाद के खिलाफ झंडा बुलंद कर रहे हैं और दूसरी तरफ खुद के ब्राह्मण शक्तिशाली होने पर घमंड करने वाले रावण का महिमा मंडन कर रहे हैं?
क्या सिर्फ इसलिए कि राम को पूजने वाले हिन्दू धर्म के लोग हैं और उनका कर्तृव्य हिन्दू धर्म के खिलाफ ही आग उगलना है? जिस राम राज्य के होने की आज के युग में कल्पना की जाती है, जिस शबरी के झूठे बेर खाने वाले राम को आज के युग में भी जातिवाद को खत्म करने का नायक माना जाता है, आज उनसे रावण की तुलना कर रावण को श्रेष्ठ बताने की कोशिश की जा रही है, आज के समय में ऐसी बौद्धिक गंदगी के खिलाफ खड़े होकर इसकी सफाई करने की जरूरत है.
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Political Analyst and Commentator, Interested in Political Strategy, Election Campaigns and E-Governance Implementation.

